1. किछ खास गल्ल होणा जरूरी है
किछ खास गल्ल होणा जरूरी है
ये गल्ल सन् 1989 दी है। जुलाई दा महीना था। मैं राजस्थान च तैनात इक तोपखाना ब्रिगेड हेडकुआटर ते बदळी होई करी अरुणाचल प्रदेश च भारत-चीन बार्डर पर तैनात भारत दिया फ़ौजा दे तोपखाने दिया इक फील्ड रेजिमेंटा च जाह्दा था। अरुणाचल प्रदेश जो पहलैं नेफा ग्लांदे थे। नेफा दी धरत 1962 दी भारत-चीन जंग च असां दे बहादर फौजियां दियां कुर्बानियां दी गुआह है जिन्हां व्ह्ली न तां ढंग दे कपड़े थे, न हथियार, न ही गोळा-बरूद।
नई दिल्ली ते नार्थ ईस्ट एक्सप्रेस च बैठी करी मैं लम्में सफरे परंत असम दे रंगिया रेलवे टेशने पर उतरेया था। तित्थू ते मैं मिसामारी तांईं रेल गड्डी पकड़ी। एह् गड्डी तेजपुर तिकर जांदी थी।मिसामारी तेजपुर ते पहलैं पौंदा है। बाद च रंगिया-तेज़पुर रेल लैंण उग्रवादियां दे हमलेयां दिया बजह ते बंद करना पई गई थी।
मेरी नोंईं यूनिट, जिसा च मैं पैह्ली बरी चलेह्या था, बॉडर पर लुम्पो कनैं नीलिया दूंहीं ठाहरीं तैनात थी। यूनिट दी हेडकुआटर बैटरी कनै दो लड़ाकू बैटरियां लुम्पो च थियां कनै तीजी लड़ाकू बैटरी होर अग्गैं जाई नै नीलिया नां दी ठाहरी पर थी। जिंञा इन्फैंट्री यूनिटां च कम्पणियां होंदियां तिंञा तोपखाना यूनिटां च बैटरियां होंदियां हन। मेरी यूनिटा दा कम्म तित्थू तैनात इक माउंटेन ब्रिगेड दी लड़ाईया च मदत करना था। तिस जमाने च तिस बड़े मुस्कल दुर्गम इलाके तिकर जांणे तांईं तवांग ते अग्गें इक-डिढ़ दिन दा पैदल रस्ता हंडणा पोंदा था। मैं तित्थू जितणा तौळा होई सकदा था, जाई करी तित्थू रैह्णे दा नंद लैणा चांहदा था। फौजी भागां वाळे होंदे हन किंञा कि तिन्हां जो उन्हां जगहां पर रैह्णे-हंडणे दा मौका मिलदा जित्थू दे, होर लोक, सिर्फ सुपने ही लई सकदे हन।
जाह्लू मैं ट्रांजिट कैम्प ऑफिस च बैठी करी अपणा कम्म निपटा दा था चाणचक मेरे दमागे च इक ख्याल आया कि ज़रा दिक्खां तां सही कि मेरिया होंणे वाळिया नोंइंयां यूनिटा दे कितणे कि जुआन असम च तैनात बख-बख यूनिटां च खिंडरेयो हन। मैं कागजे पर तिन्हां दी जाणकारी लिखणा शुरू कित्ती। लिस्ट खरी लम्मी होंदी गई। ऑफिस दा कम्म खत्म होंणे पर मैं जुआनां दे ब्यौरेयां वाळा कागद अपणे खीसे च पाई करी दोपहरां दा खाणा खाणे तांईं बाहरे जो आई गिया। तिन्हां दिनां च ट्रांजिट कैम्पां च खाणा खरा नीं बणदा था। फिरी तिस वक़्त तां अरुणाचल प्रदेश दा रस्ता बंद होंणे दिया बजह ते तिस ट्रांजिट कैम्पे च जितणे आई सकदे थे उसते मते फौजी ठहरेयो थे। मिंजो दाळी दिया जगहा प्यूल़ा पाणी ही नजर औआ दा था इस करी नै मैं दाळ नीं लई। मैं पंज-सत रोटियां चुक्कियां, वर्दिया दे खीसेयां च पाइयां कनै कैम्प ते बाहर बणिह्यो इक सिविल कैंटीन च चार अंडेयां दा ऑमलेट बणुआई करी अरामे नैं खाणे दा नंद लिया। तित्थू खांणा खांदेयां-खांदेयां दूजेयां जुआनां कन्नैं गल्ल-बात करी पता लग्गेया भई कि मेरी नौंईं यूनिट दे किछ जुआन नेडैं ही इक 'एयर ऑब्जरवेशन पोस्ट स्क्वाड्रन' च ठैह्रेयो थे। सैह् थलसेना दी चीता हेलीकाप्टरां वाळी यूनिट थी।
खाणा खाई करी मैं तित्थू तांईं पैदल चली पिया जित्थू मेरी नोंईं यूनिट दे जुआन ठैह्रेयो थे। मैं ओत्थू जाई करी तिन्हां कन्नैं मिलेया कनैं तिन्हां जो दस्सेया भई कि मैं तिन्हां दिया यूनिटा च जाह्दा कनैं कुसी अफसरे कन्ने गल्ल करना चांह्दा। मिंजो तिन्हां ते पता लग्गेया भई कि उस मौकैं तित्थू यूनिट दा कोई अफसर नीं था अपर अगले रोज इक लेफ्टिनेंट कर्नल, जेह्ड़े यूनिट दे सेकंड-इन-कमांड थे, अरुणाचल प्रदेश ते हैलीकॉप्टरे च औआ दे हन। मैं तिन्हां जो ग्लाई आया कि अगले दिनैं मैं उन्हां कन्नैं मिलणा ओंणा है। अपणे बारे च तिन्हां जो दस्सणे तांईं भी ग्लाया था।
जाह्लू मैं अपणे खीसे ते मूवमेंट ऑर्डर दी कॉपी कह्डा दा था तां मेरे हत्थैं युनिट दे जुआनां दे ब्यौरे वाळा सैह् कागद भी आई गिया जेह्ड़ा मैं पिच्छलैं रोजैं ट्रांजिट कैम्प दे दफ्तर च तियार कित्तेह्या था। सोचेया कैंह् नीं तिस्सेयो अफसर होरां जो दस्सी देयां। मैं अपणे खीसे ते सैह् कागद कह्ढी करी तिन्हां साह्मणे करी दित्ता था। तिन्हां तिस कागदे जो अपणे हत्थैं पकड़ी लिया कनैं तिस पर नजर मारी करी सैह् मिंजो बक्खी बड़िया हैरानिया नैं दिक्खणा लग्गे थे। मैं तिन्हां जो दस्सेया था कि मिंजो ट्रांजिट कैम्प काह्लू भी कोर हेडकुआटर च भेजी सकदा है। जे मैं इक बरी तित्थू चली गिया तां मैं फिरी यूनिट दे कम्मैं नीं ओंणा है। मैं तिन्हां जो युनिट कन्नैं तौळे ते तौळा जाई मिलणे दी अपणी चाह्णा भी सणाई-ती थी। तिन्हां मेरी गल्ल सुणी करी मिंजो ग्लाया कि मैं ट्रांजिट कैम्प वापस जाई करी तियार रिहां, अगले दिन तिन्हां मिंजो लैणा औंणा है।
मिंजो बाद च पता चल्लेया था कि यूनिट दे कमांडिंग अफसरैं सड़क बंद होंणे दिया बजह ते चीन दे बॉडर पर तैनात अपणी घटदी फौजी नफरी दा फिकर करदेयां अपणे नंबर दो जो मिसामारी इस मकसदे नैं भेजह्या था भई कि अपणे खिंडरे जुआनां दी जाणकारी मिली जाए कनैं अग्गे दी हर मुमकिन कारबाई कित्ती जाई सके। बिण बोलेयां मेरी कठेरिह्यो जांणकारी तिन्हां दे बड़े कम्मैं आई कनैं तिन्हां जो यूनिट च पोंह्चणे दी मेरी काह्ळी भी पसिंद आई थी। बाद च सैह् यूनिट दे कमाण अफसर बणें कनैं यूनिट च तिन्हां दे सेवा समैं जो समाप्त होंणे तिकर मैं तिन्हां दा चेहता बणी रिहा। शैद तिन्हां मिंजो च किछ खास गल्ल दिक्खी लइह्यो थी। दुनिया दिया भीड़ा च अपणे आपे जो लग्ग दसणे तांईं किछ खास गल्ल होणा जरूरी है। हर कोई बड्डे कम्म नीं करी सकदा पर चज्जे नै कित्तेयो छोटे-छोटे कम्म भी माह्णुआं दा महत्व बधाई दिंदे हन। कुसी भी माह्णुयें दे निक्के-निक्के ममूली लगणे वाळे, दूजेयां ते हटी करी नै कित्तेह्यो कम्म, तिस दी दूजेयां दियां नजरां च इक खास तस्बीर बणाई दिंदे हन।
― भगत राम मंडोत्रा
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कोई खास बात होना ज़रूरी है
बात सन् 1989 की है। जुलाई का महीना था। मैं राजस्थान में तैनात एक तोपखाना ब्रिगेड मुख्यालय से स्थानांतरित हो कर अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन सीमा पर तैनात भारतीय सेना के तोपखाने की एक फील्ड रेजिमेंट में जा रहा था। अरुणाचल प्रदेश को पहले नेफा के नाम से जाना जाता था। नेफा की धरती 1962 के भारत-चीन युद्ध में हमारे वीर सैनिकों के बलिदानों की साक्षी है जिनके पास न तो ढंग के कपड़े थे, न हथियार, न ही गोला-बारूद।
नई दिल्ली से नार्थ ईस्ट एक्सप्रेस में बैठ कर मैं लम्बे सफर के बाद असम में स्थित रंगिया रेलवे स्टेशन पर उतरा था। वहां से मैंने मिसामारी के लिए रेलगाड़ी पकड़ी। ये गाड़ी तेजपुर तक जाती थी। मिसामारी तेजपुर से पहले पड़ता है। रंगिया-तेजपुर रेलवे लाइन कालांतर में उग्रवादियों के हमलों के कारण बंद करनी पड़ गई थी।
उन दिनों मिसामारी में सेना का ट्रांजिट कैम्प हुआ करता था। अरुणाचल प्रदेश के तवांग की तरफ तैनात सेना की यूनिटों में सेवारत सैनिकों का आना-जाना इसी कैम्प के माध्यम से नियंत्रित होता था। जब मैं मिसामारी ट्रांजिट कैंप में पहुंचा तो पता चला कि ज़मीन खिसकने के कारण अरुणाचल प्रदेश का तवांग (कामेंग सेक्टर) की तरफ जाने वाला रास्ता कई सप्ताहों से कटा पड़ा था। अरुणाचल प्रदेश की तरफ सैनिकों की आवाजाही बंद हो गयी थी। ट्रांजिट कैंप में देश के दूसरे भागों से अरुणाचल प्रदेश में जाने वाले सैनिकों, जिनमें छूटी काट कर वापस आने वाले सैनिक भी शामिल थे, की भीड़ को कम करने के लिए उन्हें असम में स्थित विभिन्न सैन्य यूनिटों के साथ अटैच किया जा रहा था। मुझे बताया गया कि मैं एक दो दिन ट्रांजिट कैंप ऑफ़िस में काम करूं उसके बाद मुझे तेजपुर स्थित सेना की चौथी कोर के मुख्यालय में भेजा जा सकता है। यह जान कर मुझे निराशा हुई क्योंकि मैं शीघ्रातिशीघ्र अपनी नई यूनिट में शामिल होना चाहता था।
मेरी नई यूनिट, जिसमें मैं पहली बार जा रहा था, सीमा पर स्थित लुम्पो और नीलिया दो स्थानों में तैनात थी। यूनिट की हेडकुआटर बैटरी और दो लड़ाकू बैटरियां लुम्पो में थी और तीसरी लड़ाकू बैटरी उससे और आगे नीलिया नामक स्थान में थी। जैसे इन्फेंट्री यूनिटों में कम्पनियां होती हैं उसी तरह तोपखाना यूनिटों में बैटरियां होती हैं। मेरी यूनिट का मुख्य कार्य वहां तैनात एक माउंटेन ब्रिगेड की युद्ध में सहायता करना था। उस समय इस अति कठिन दुर्गम इलाके में पहुंचने के लिए तवांग से आगे एक-डेढ़ दिन का पैदल रास्ता तय करना पड़ता था। मैं वहां जितनी जल्दी हो सके, पहुंच कर उस स्थान में तैनाती के रोमांच को अनुभव करना चाहता था। सैनिक भाग्यशाली होते हैं क्योंकि उन्हें उन जगहों पर रहने-विचरने का अवसर मिलता है जहां जाने की दूसरे लोग मात्र कल्पना ही कर सकते हैं।
जब मैं ट्रांजिट कैम्प ऑफ़िस में बैठा अपना काम निपटा रहा था तो अचानक मेरे मन में विचार आया कि ज़रा देखूं तो मेरी होने वाली नई यूनिट के कितने सैनिक असम स्थित विभिन्न यूनिटों में बिखरे पड़े हैं। मैंने कागज पर उनके बारे में ज़रूरी जानकारी लिखना शुरू कर दी। सूची काफी लंबी होती गयी। ऑफिस का काम समाप्त हो जाने पर मैंने सैनिकों के ब्यौरों वाला कागज़ जेब में रखा और दोपहर का खाना खाने के लिए ऑफ़िस से बाहर निकल आया। उन दिनों ट्रांजिट कम्पों में खाना अच्छा नहीं बनता था। फिर उस समय तो उस ट्रांजिट कैम्प में अरुणाचल प्रदेश का रास्ता बंद हो जाने के कारण क्षमता से अधिक सैनिक ठहरे हुए थे। मैंने दाल नहीं ली क्योंकि दाल की जगह पीला सा पानी ही नज़र आ रहा था। मैंने 5-7 रोटियाँ उठायीं, वर्दी की जेब में रखीं और कैम्प के बाहर स्थित सिविल कैंटीन में चार अंडों का आमलेट बनवा कर आराम से रोटियों का आनंद लिया। जब मैं खाना खा रहा था तो वहां दूसरे सैनिकों से बातचीत के दौरान पता चला कि मेरी नई यूनिट के कुछ जवान नजदीक स्थित 'एयर ऑब्जरवेशन पोस्ट स्क्वाड्रन' में ठहरे हुए थे। ये थलसेना की चीता हेलिकॉप्टरों से सज्जित यूनिट थी।
खाना समाप्त करके मैं उस जगह के लिए पैदल चल दिया जहां मेरी नई यूनिट के सैनिक ठहरे हुए थे। मैं वहां जा कर उनसे मिला और उन्हें बताया की मैं उनकी यूनिट में जा रहा हूं और किसी अफ़सर से बात करना चाहता हूं।मुझे उनसे पता चला कि वहां उस समय यूनिट का कोई अफ़सर नहीं था परन्तु अगले दिन यूनिट के एक लेफ्टिनेंट कर्नल जो उप-कमान अधिकारी थे हेलीकॉप्टर द्वारा अरुणाचल प्रदेश से आने वाले थे। मैंने उन्हें बताया कि मैं अगले दिन आकर उनसे मिलूंगा जब वह आएं उनसे मेरा जिक्र किया जाए।
दूसरे दिन मैं अपने उप-कमान अफ़सर से मिला। वो एक सिक्ख लेफ्टिनेंट कर्नल थे। मैंने अपना परिचय दिया। उन्होंने कुशलक्षेम की औपचारिकता के उपरांत मुझ से पूछा, “आपको तो जनवरी में आना चाहिए था इतनी देरी क्यों की?” मैंने थोड़ी देर चुप रह कर धीरे से जवाब दिया, “सर, मैं मूवमेंट आर्डर के अनुसार सही समय पर आया हूँ।” मैंने संचालन आदेश की एक प्रति जो मेरी जेब में पड़ी थी निकाल कर उनकी ओर बढ़ा दी थी पर उन्होंने उसे नहीं देखा था। वो सब कुछ समझते थे पर फिर भी उन्होंने मुझ से यह सवाल किया था।
जब मैं अपनी जेब से संचालन आदेश की प्रति निकाल रहा था तो मेरे हाथ में यूनिट के सैनिकों के विवरण वाला वह कागज भी आ गया जो पिछले दिन मैंने ट्रांजिट कैम्प के कार्यालय में तैयार किया था। सोचा क्यों न उसे अधिकारी महोदय को दिखा दिया जाए। मैंने अपनी जेब से वह कागज भी निकाल कर उनकी ओर बढ़ा दिया। उन्होंने उसे अपने हाथ में थाम लिया। उस कागज को कुछ क्षण देखने के उपरांत उप-कमान अधिकारी महोदय मेरी तरफ आश्चर्य से देखने लगे। मैंने उन्हें बताया कि मुझे ट्रांजिट कैम्प से कभी भी कोर हेडक्वार्टर्स में भेजा जा सकता है अगर मैं एक बार वहां चला गया तो फिर यूनिट को अपनी सेवायें नहीं दे पाउँगा। मैंने उन्हें यूनिट में जल्दी से जल्दी शामिल होने की अपनी मंशा से अवगत कराया। उन्होंने मुझे बताया कि मैं ट्रांजिट कैंप में वापस जाकर तैयार रहूं, वो मुझे अगले दिन सुबह लेने आएंगे।
मुझे बाद में पता चला कि यूनिट के कमान अधिकारी ने चीन की सीमा पर तैनात अपनी यूनिट की सड़क मार्ग बंद होने के कारण घटती सैनिक संख्या से चिंतित हो कर अपने नंबर दो को मिसामारी इस मकसद से भेजा था कि वो अपने बिखरे हुए सैनिकों के बारे में जानकारी जुटा कर आगे की हर संभव कार्यवाही करें। बिना बताए मेरे द्बारा एकत्रित की गयी जानकारी उनके बहुत काम आई और उन्हें यूनिट में शीघ्र शामिल होने की मेरी उत्सुकता भी भा गयी। कालांतर में वह यूनिट के कमान अधिकारी बने और यूनिट में उनके सेवाकाल पर्यंत मैं उनका चेहता बना रहा। शायद उन्हें मुझ में कुछ खास बात नज़र आई थी। दुनिया की भीड़ में अपने आप को अलग दिखाने के लिये व्यक्ति में कोई खास बात होना ज़रूरी है। हर कोई बड़े काम नहीं कर सकता है पर ढंग से किए गए छोटे-छोटे काम भी व्यक्ति का महत्व बढा देते हैं। किसी भी व्यक्ति के द्वारा छोटे-छोटे मामूली से लगने वाले दूसरों से हट कर किये गए काम उसका दूसरों की नज़र में एक बिशेष स्थान बना देते हैं।
– भगत राम मंडोत्रा

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