17. तू आई नै ताँ दस, छुट्टी मैं भेजगा

 


तू आई नै ताँ दस, छुट्टी मैं भेजगा


फौज दे 'बैटल फिजिकल एफिशिएंसी टेस्ट' दा जिक्र होया ताँ तिस टेस्ट कन्नै जुड़ेह्यो इक होर  वाकया दी याद ताजा होई आई।  दिसंबर सन् 1978 दी गल्ल है, मैं फौज दे मध्यम तोपखाने दी इक रेजिमेंट कन्नै  दिल्ली कैंट च तैनात था। दिसंबर दा दूजा हफ्ता चल्लेह्या था। मेरी यूनिट दी ब्रिगेड कमाँडर दी सालाना इंस्पेक्शन होणे वाळी थी। तिस इंस्पेक्शन च खरा उतरने ताँईं सारेयाँ जो बहोत मेहनत करना पोंदी है।


तिस यूनिट च पहली लड़ाकू बैटरी अहीराँ दी थी कनै बाकी दोह्यो लड़ाकू बैटरियाँ सिलसिलेवार राजपूताँ कनै सिखाँ दियाँ थियाँ।  मैं वीर अहीराँ सौगी था। तिस इंस्पेक्शन दे दौरान यूनिट दे सारेयाँ अफसराँ, सरदाराँ (जे.सी.ओ जो सरदार भी बोल्या जाँदा है) कनै जुआनाँ जो  'बैटल फिजिकल एफिशिएंसी टेस्ट' ते होई करी गुजरना पोंदा है।  तिस टेस्ट ते छूट सिर्फ तय उम्र ते बड्डेयाँ कनै मेडिकल कैटेगिरी डाउन फौजियाँ जो ही मिलदी है।  सैह् टेस्ट दो दिनाँ परंत होणे वाळा था। मेरी बैटरी दे सीनियर जे.सी.ओ, सूबेदार चंदरभान यादव साहब मेरे दफ्तर च बैठी करी तिन्हाँ फौजियाँ दी लिस्ट तैयार करा दे थे जिन्हाँ जो इंस्पेक्शन खत्म होंदेयाँ ही छुट्टी जाणा था। 


मेरे व्याह जो होयो अज्हें इक साल ही होह्या था कनै मेरा तिस साल दी छुट्टियाँ दा सारे दा सारा कोटा मुकी चुक्केह्या  था। जिंञा ही यादव साहब होराँ सैह् लिस्ट मिंजो थमाई, मैं सोचणा लगा काश! तिसा च मेरा भी नाँ होंदा। यादव साहब होंराँ शैद मेरे चेहरे दे भाव पढ़ी लै  थे। तिन्हाँ जाँदेयाँ-जाँदेयाँ मिंजो ग्लाया “दिक्ख भगत, जेकर तू बी.पी.ई.टी च सारी रेजिमेंट च पहले ओणे वाळे पंज जुआनाँ च आई जाँदा है ताँ तिज्जो दस दिनाँ दी छुट्टी मिली जाणी है।”  “लेकिन सर, मैं ताँ सारी छुट्टी कट्टी चुक्केह्या है” मैं तिन्हाँ जो तुरंत जवाब दित्ता था। “तू आई नै ताँ दस, छुट्टी मैं भेजगा”। 


यादव साहब इक सुलझे होए मेच्योर पर्सनेलिटी वाळे जूनियर कमीशंड ऑफिसर थे। मिंजो तिन्हाँ दे वायदे पर रति भर भी शक नीं था अपर मिंजो लग्गेया कि पहले पंज च ओणा मिंजो ताँईं लगभग नामुमकिन देहा था कैंह् कि पहलियाँ नौ-दस जगहाँ ताँ साल भर खेलाँ दा भ्यास करने वाळे यूनिट दे स्पोर्ट्स मैन लई जाँदे थे।  फिरी भी मैं ठाणी लिया था कि मैं सैह् जगह ज़रूर हासिल करनी है कनै दस दिनाँ दिया छुट्टिया पर घरें जाणा है।  


टेस्ट वाळे दिन मैं जी-जान लगाई नै दौड़ेया कनै मेरे भाग खरे थे कि में पंजवें नंबर पर आई गिया। छठा आदमी मिंजो ते घट ते घट बीह् गैं पिच्छें था। मैं बहोत खुस था। मुकर्रर कटघरे च पौंह्चदेयाँ ही, फुल्लेह्याँ साहाँ कन्नै मैं दूर खडोतेयो यादव साहब होराँ बक्खी जोरे नै उआज लगाई ‘स..अ.. अ...र’ कनै अपणी छाती थिहाळिया कन्नै ठोकी। तिन्हाँ अपणा हत्थ ठुआई करी इस गल्ल दी तसदीक कित्ती कि तिन्हाँ मिंजो तिस नंबर पर ओंदेयो दिक्खी लिया था।  उमरा दे हिसाबे नै यादव साहब होराँ जो बी.पी.ई.टी. लागू नीं थी, तिन्हाँ जो सिर्फ पी.पी.टी (फिजिकल प्रोफिशिएंसी टेस्ट) लागू थी।


टेस्ट खत्म होंदेयाँ ही यादव साहब मेरे दफ्तर च आए कनै मिंजो ते पुछणा लगे, “भगत, जिन्हाँ जुआनाँ दी मैं तिज्जो कल लिस्ट दित्ती थी तिन्हाँ दे लीव सर्टिफिकेट तैयार हन्न?” “हाँ सर, ये रैहे।” मैं जवाब दित्ता था। लीव सर्टिफिकेट रेडियो ऑपरेटर विशंभर यादव नै बणाये थे जेह्ड़ा ऑफिस दे कम्माँ च मेरा हत्थ बटाँदे थे। यादव साहब होराँ विशंभर जो कन्नै लई करी बैटरी कमाँडर दे दफ्तर च लीव सर्टिफिकेटाँ पर दस्तखत करुआणा चली गै। मेरी जाणकारी च मेरा लीव सर्टिफिकेट नीं बणेह्या था। 


मिंजो इसा गल्ला दी भी जाणकारी थी कि मेरे बैटरी कमाँडर, जिन्हाँ लीव सर्टिफिकेटाँ पर साइन करने थे, तेह्ड़ी किछ देर ताँईं ही मौजूद थे, किंञा कि तिन्हाँ इक स्टेशन कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी च मेंबर दे तौर पर सामल होणा दूजी यूनिट च जाणा था। मिंजो निराशा होई पर मिंजो यादव साहब होराँ पर पूरा भरोसा था कि सैह्  कदी झूठ नीं ग्लाई सकदे थे। 


विशंभर यादव लीव सर्टिफिकेटाँ कनै पे-बुकां जो इक-इक करी नै बैटरी कमाँडर दे साह्म्णे दस्तखताँ ताँईं रखदे जाह्दे थे कनै यादव साहब बैटरी कमाँडर जो तिन्हाँ दे बारे च ब्रीफ करदे जाह्दे थे। मिंजो तिन्हाँ दियाँ उआजाँ साफ सुणोहा दियाँ थियाँ।


मैं टेंशन च था कि मेरिया छुट्टिया दा क्या होंगा। बैटरी कमाँडर इक सिख मेजर थे।  मिंजो आखिर च बैटरी कमाँडर ग्लाँदे सुणोहे, “यादव साहब, ये भगत राम दा लीव सर्टिफिकेट किंञा बणाई दित्ता सैह् भी दस दिनाँ दा? तिसदी ताँ कोई भी छुट्टी नीं बचिह्यो है।”

  

“साहब, भगत राम बी.पी.ई.टी च बैटरी च सेकंड कनै रेजिमेंट च फिफ्थ आह्या है। मैं तिस कन्नै वादा कित्तेह्या था। तुसाँ साइन करी दिया। तिसदे वापस ओणे पर लीव सर्टिफिकेट जो फाड़ी दिंह्गे।” यादव साहव होराँ बैटरी कमाँडर जो रिक्वेस्ट कित्ती थी कनै बैटरी कमाँडर होराँ लीव सर्टिफिकेट पर अपणे साइन करी दित्ते थे। 


यादव साहब होराँ बैटरी कमाँडर ते साइन करुआई करी ऑफिस ते तुरंत बाहर निकळी गै थे। मैं दौड़ी करी तिन्हाँ दे पिच्छें बाहर गिया कनै तिन्हाँ दे साह्मणे आई नै इक जोरदार सेल्यूट देई नै तिन्हाँ जो “थैंक यू सर” बोलेया। यादव साहब होराँ मेरे सेल्यूट दा जवाब देई करी मुस्कराँदे होए चले गै थे। 

  

जाह्लू मैं विशंभर ते पुच्छेया कि मेरा लीव सर्टिफिकेट काह्लू बणेह्या था ताँ तिन्हाँ दस्सेया कि यादव साहब होराँ तिन्हाँ जो, मिंजो तिस बारे च दसणे ताँईं मना करी दित्तेह्या था। विशम्भर होराँ मेरा लीव सर्टिफिकेट बणाई करी अप्पु व्ह्ली बक्खरा रक्खी लिया था कनै मिंजो ते चेक करुआणे ताँईं दूजे सर्टिफिकेटाँ सौगी मेरे मेजे पर नीं रक्खेह्या था।


― भगत राम मंडोत्रा



तुम आ कर तो दिखाओ, छुट्टी मैं भेजूंगा



सेना के 'युद्ध शरीरिक क्षमता परीक्षण' का उल्लेख होने से उस परीक्षा से जुड़ी एक और घटना की याद ताजा हो आई।  दिसंबर सन् 1978 की बात है, मैं सेना के मध्यम तोपखाने की एक रेजिमेंट के साथ दिल्ली कैंट में तैनात था। दिसंबर का दूसरा सप्ताह चल रहा था। मेरी यूनिट का ब्रिगेड कमाँडर द्वारा बार्षिक निरीक्षण होने वाला था। उस निरीक्षण में खरा उतरने के लिए सभी को बहुत मेहनत करनी पड़ती है।


उस यूनिट में पहली लड़ाकू बैटरी अहीरों की थी और बाकी दोनों लड़ाकू बैटरियाँ क्रमशः राजपूतों और सिखों की थीं।  मैं वीर अहीरों के साथ था। उस निरीक्षण के दौरान यूनिट के सभी अफसरों, सरदारों (जे.सी.ओ को सरदार भी कहा जाता है) और जवानों को ‘युद्ध शारीरिक क्षमता परीक्षण’ से हो कर गुजरना पड़ता है।  उस टेस्ट से छूट केवल तय आयु से बड़े और मेडिकल कैटेगिरी डाउन सैनिकों को ही मिलती है। वह टेस्ट दो दिन बाद होने वाला था। मेरी बैटरी के सीनियर जे.सी.ओ, सूबेदार चंदरभान यादव साहब मेरे कार्यालय में बैठ कर उन सैनिकों की सूची तैयार कर रहे थे जिनको निरीक्षण समाप्त होते ही छुट्टी पर जाना था। 


मेरी शादी को हुए अभी एक वर्ष ही हुआ था और मेरा उस वर्ष की छुट्टियों का सारा का सारा कोटा समाप्त हो चुका था। जैसे ही यादव साहब ने वह सूची मुझे थमाई, मैं सोचने लगा काश! उसमें मेरा भी नाम होता। यादव साहब ने सम्भवतः मेरे चेहरे के भाव पढ़ लिए थे। उन्होंने जाते-जाते मुझ से कहा “देख भगत, अगर तुम बी.पी.ई.टी में पूरी रेजिमेंट में पहले आने वाले पांच जवानों में आ जाते हो तो तुम्हें 10 दिन की छुट्टी मिल जाएगी।”  “लेकिन सर, मैं सारी छुट्टी काट चुका हूँ” मैंने उन्हें तुरंत जवाब दिया था। “तुम आ कर तो दिखाओ, छुट्टी मैं भेजूंगा”। 


यादव साहब एक सुलझे हुए परिपक्व व्यक्तित्व वाले जूनियर कमीशंड ऑफिसर थे। मुझे उनके वादे पर रति भर भी संदेह नहीं था परंतु मुझे लगा कि पहले पांच में आना मेरे लिए लगभग असंभव सा था क्योंकि पहले नौ-दस  स्थान तो वर्ष भर खेल अभ्यास करने वाले यूनिट के स्पोर्ट्स मैन ले जाते थे।  फिर भी मैंने ठान लिया था कि मैं यह स्थान ज़रूर हासिल करूंगा और दस दिन की छुट्टी पर घर जाऊंगा।  


टेस्ट वाले दिन मैं जी-जान लगा कर दौड़ा और भाग्यवश पांचवें स्थान पर आ गया। छठा आदमी मुझ से कम से कम 20 कदम पीछे था। मैं बहुत खुश था। निश्चित कटघरे में पहुँचते ही, फूली हुई साँसों के साथ मैंने दूर खड़े यादव साहब की ओर जोर से  आवाज लगाई ‘स..अ.. अ...र’ और अपनी छाती हथेली से ठोकी। उन्होंने अपना हाथ उठा कर इस बात की तसदीक़ कर दी कि उन्होंने मुझे उस स्थान पर आते देख लिया था।  आयु के हिसाब से यादव साहब  को बी.पी.ई.टी. लागू नहीं थी, उन्हें केवल पी.पी.टी (फिजिकल प्रोफिशिएंसी टेस्ट) लागू थी।


टेस्ट समाप्त होते ही यादव साहब मेरे कार्यालय में आए और मुझ से पूछने लगे, “भगत, जिन जवानों की मैंने तुम्हें कल लिस्ट दी थी उनके लीव सर्टिफिकेट तैयार हैं?” “हाँ सर, ये रहे।” मैंने जवाब दिया था। अवकाश प्रमाणपत्र रेडियो ऑपरेटर विशंभर यादव ने बनाये थे जो ऑफ़िस के कामों में मेरा हाथ बंटाते थे। यादव साहब विशंभर को साथ लेकर बैटरी कमाँडर के कार्यालय में अवकाश प्रमाण पत्रों पर हस्ताक्षर करवाने चले गए। मेरी जानकारी में मेरा अवकाश प्रमाणपत्र नहीं बना था। 


मुझे इस बात की भी जानकारी थी कि मेरे बैटरी कमाँडर जिन्होंने अवकाश प्रमाण पत्रों पर हस्ताक्षर करने थे, उस दिन कुछ देर के लिए ही उपलब्ध थे क्योंकि उन्होंने एक स्टेशन कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी में सदस्य के रूप में भाग लेने दूसरी यूनिट में जाना था। मुझे निराशा हुई पर मुझे यादव साहब पर पूरा भरोसा था कि वह कभी झूठ नहीं बोल सकते थे। 


विशंभर यादव अवकाश प्रमाणपत्र और पे-बुक एक-एक करके बैटरी कमाँडर के सामने हस्ताक्षर के लिए रखते जा रहे थे और यादव साहब बैटरी कमाँडर को उनके बारे में संक्षेप में बताते जा रहे थे। मुझे उनकी आवाजें स्पष्ट सुनाई दे रहीं थीं।  


मैं तनाव में था कि मेरी छुट्टी का क्या होगा। बैटरी कमाँडर एक सिख मेजर थे।  मैंने आखिर में बैटरी कमाँडर को कहते सुना, “यादव साहब, ये भगत राम का लीव सर्टिफिकेट कैसे बना दिया, वो भी दस दिन का? उसकी तो कोई भी छुट्टी नहीं बची है।”

  

“साहब, भगत राम बी.पी.ई.टी में बैटरी में सेकंड और रेजीमेंट में फिफ्थ आया है। मैंने उससे वादा किया था। आप साइन कर दीजिए। इसके वापस आने पर लीव सर्टिफिकेट को फाड़ देंगे।” यादव साहव ने बैटरी कमाँडर से अनुरोध किया था, और बैटरी कमाँडर ने लीव सर्टिफिकेट पर अपने हस्ताक्षर कर दिए थे। 


यादव साहब बैटरी कमाँडर से हस्ताक्षर करवा कर कार्यालय से तुरंत बाहर निकल गए थे। मैं दौड़ कर उनके पीछे बाहर गया और उनके सामने आकर एक जोरदार सेल्यूट करके मैंने उन्हें “थैंक यू सर” कहा। यादव साहब मेरे सेल्यूट का जवाब देकर मुस्कराते हुए चले गए थे। 

  

जब मैंने विशंभर से पूछा कि मेरा अवकाश प्रमाणपत्र कब बना तो उन्होंने बताया कि यादव साहब ने उन्हें मुझे इस बारे में बताने के लिए मना कर दिया था। विशम्भर ने मेरा अवकाश प्रमाणपत्र बना कर अपने पास अलग रख लिया था और मेरे द्वारा निरीक्षण के लिए दूसरे प्रमाणपत्रों के साथ मेरी मेज पर नहीं रखा था।


― भगत राम मंडोत्रा




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